आर्य विद्वान

स्वामी नित्यानंद जी

01/05/2026 • 1 मिनट का पाठन

स्वामी नित्यानंद जी

1885 से 24 अप्रैल 1977

संगीत शिक्षा :- बचपन में आपकी रुची इस प्रकार की थी कि जिस नई चीज को अच्छा समझते थे वही शीध्र ही सीख लेते थे। बीन सीखी और बांसुरी भी। खड़ताल पर तो आल्हा गाया ही करते थे।

एक बार अपनी ससुराल कुकड़ौला में आर्य समाज के प्रसिद्ध भजनोपदेशक चौधरी ईश्वर सिंह गहलोत आये। वहां पर उनका मनमोहक बाजा सुनकर मन में आया कि अन्य सब साजबाज व्यर्थ हैं, बजाने व सीखने की चीज तो यही है। चौधरी ईश्वर सिंह की गान विद्या ने भी आपको मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी मोहक कविता में सिद्धांतो का पुट व काव्य गंभीरता को देखकर आपकी विशेष श्रद्धा हो गई। चौधरी ईश्वर सिंह की प्रचार शैली में चित्रित देश भक्ति और स्वराज की प्रेरणा भी आकर्षण का एक मुख्य कारण था। इसी लिए आपने ईश्वर सिंह को अपना गुरु स्वीकार कर लिया और उनकी कविताएं सुनकर व पढ़कर खुद भी रचनाएं बनाने लगे।

अपने गुरु ईश्वर सिंह से आपने बाजा सिखाने की प्रार्थना कि परंतु उन्होने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि तुम्हारी अंगुलिया मोटी मोटी हैं तुम्हें बाजा बजाना नहीं आएगा। अपने दस साथियों के साथ मिलकर दिल्ली से नया बाजा खरीद कर लाए। क्योंकि रुची वाले किसी भी काम को सीखने में कोई कठिनाई नहीं समझते।

यह पूर्वजन्म के संस्कार का ही फल था। दूसरी बार उसी गांव में जब चौधरी ईश्वर सिंह जी आये तो बाजा बजाकर दिखलाया " यह देखो आप क्या कहते थे मैने सीख लिया " यह देखकर चौधरी ईश्वर सिंह जी बड़े प्रसन्न हुए ओर उत्साहवर्धन किया। बुपनियां गांव के मास्टर बालमुकुंद को भी आपने बाजा सिखाया।।

संकटमोचक की भूमिका (लोहारु सत्याग्रह) : ईक्कस (जींद) निवासी पत्रवाहक गंगानन्द आर्य जब लोहारु डाकखाने में आये तो उन्होने किसी साहसी समाज सुधारक के बारे में पुछा। लोगों ने ठाकुर भगवंत सिंह का नाम बताया। आर्य मिशनरी गंगानन्द सत्यार्थी ने ठाकुर साहब को आर्य समाज के रंग में रंग दिया। आपके मकान पर ही आर्य समाज का प्रचार कार्य शुरु हो गया। इसकी सूचना पाकर नवाब लोहारु ने ठाकुर साहब को नौकरी से हटा दिया। और सत्यार्थी जी का स्थानांतरण हांसी करवा दिया। दीनबंधु भगत फुल सिंह को इस समाचार का पता चला तब उन्होने कहा कि " न्योनंद सिंह को बुलाओ "

भगत जी ने न्योनंद सिंह को पूरी घटना का पता लगाने के लिए हांसी भेजा। आप गए और पूरी घटना की जानकारी लेकर गुरुकुल भैंसवाल में लौटकर भगत जी को बताई। भगत जी ने आपको प्रचार के लिए लोहारु भेजा। उसी दिन आर्य प्रतिनिधि सभा की ओर से भेजे गये पंडित समरसिंह वेदालंकार श्री बलबीर झाबर सिंह जी की भजन मंडली सहित लोहारु आये। यह घटना 1940 की है। स्वामी जी के साथ मुंशीराम व जयसिंह आदि तीन बालक भी थे। स्वामी जी ने ठाकुर भगवंत आर्य को भगत जी की ओर से सांत्वना देते हुए उनका संदेह दिया की आप घबराएं नहीं।

नवाब के दीवान ने आकर कहा कि यहां प्रचार नहीं होगा। स्वामी जी ने कहा कि हम तो प्रचार के लिए ही आए हैं और प्रचार करके जाएगें। उन दिनों लोहारु में प्रचार करना मौत को निमंत्रण देना था। उससे पहले श्री धारी उपदेशक के साथ जो दुर्व्यवहार नवाब ने किया था वह दिल को कंपा देने वाला था। धन्य निर्भिक प्रचारक ! तेरे सामने ऋषि का वह दृढव्रतधारी रुप था। "चाहे जोधपुर के लोग मेरी अंगुलियों की बत्ती बनाकर जला दें किंतु मैं वहां अवश्य जाकर सत्य उपदेश करूंगा" दीवान के पुन: आने पर निम्नलिखित वार्तालाप हुआ।

दीवान :- गांव में प्रचार के लिए मत जाना, यहीं पर कर लो।

स्वामी जी :- हम गांव में ही प्रचार करने के लिए आये हैं।

दीवान :- अच्छा तो सूचना देते रहना कि कहां पर जाते हो?

स्वामी जी :- खुद ही पता लगाना।

प्रचार यात्रा :-सर्व प्रथम श्री भगवंत सिंह आर्य के द्वारा भेजे गए ऊंट से बारवास गांव में गए। वहां ठहरने का स्थान पूछा तो सब चुपचाप चले गए। नवाब का आतंक जो था। पहले वाली घटना से भयभीत थे। आर्योपदेशक धारी बारवास से ही पकड़े गये थे। पश्चात शिवालय में चले गए। वहां पर स्थित साधु ने कहा कि यहां जगह नहीं है। आपने कहा "जगह तो है और ये तेरी ही बनाई हुई नहीं है"। आप बाहर आ गए। भजनियों को देखकर एक बार सारे गांव के आदमी इकट्ठे हो गए परंतु थोड़ी देर में सभी वापिस चले गए और फिर कोई नहीं आया। न हि भोजनादि की व्यवस्था हो पाई। सायं संध्या का समय हो गया।

शिवालय से बाहर टीले पर बैठकर स्वामी जी आदि ने संध्या शुरू कर दी। मंत्रो की गुंजार सुनकर गांव के बालक आ गए। उन्होने पूछा - भजन करोगे ? आपने कहा कि हां, करेगें। तुम रोटी आदि ले आओ। बालक ले आए। भोजन किया और पुन : गांव में जाकर मेज व लालटेन मंगवाई श्री शिवनारायण जी ने लाकर दी। गांव में दो दिन प्रचार हुआ। यद्यपि भय के मारे लोगों ने रुची नहीं दिखाई और न ही अच्छी तरह से सुना। अधिकतर लोग गलियों में खाट बिछाकर सोने के बहाने सुनते रहे। पहले दिन प्रचार की समाप्ति पर एक सुबेदारनी ने गांव वालो को फटकारते हुए कहा कि " तुम सारे प्रचार सुनकर चल पड़े, इन्हें रोटी तक नहीं दी। क्या तुमको नवाब खा जाता। कल मैं प्रचार करवाऊंगी। " उन्होने खाट दुध आदि की व्यवस्था कर दी और गांव में ठहरा दिया। अगले दिन प्रचार सफलतापूर्वक हो गया। वीर महिला मुख्याध्यापक श्री रामसिंह आर्य की माता जी थी।

तदनंतर बिसलवास व गिगनाऊ में एक एक दिन प्रचार करके गांव सिंघानी में पहुंचे। वहां पर भी किसी ने रोटी पानी की व्यवस्था नहीं की। स्वामी जी ने स्वयं भोजन बनाया। ओर खाकर प्रचार किया। पश्चात पहाड़ी गांव में दो दिन प्रचार किया।

पहले दिन तो गांव के चौक में ही बैठे रहे। वहीं पर एक आदमी ने रोटी लाकर दी और लालटेन आदि का भी प्रबंध किया व प्रचार हुआ। अगले दिन एक नम्बरदार ने ठहराया और भोजनादि का प्रबंध किया। पहाड़ी में यज्ञोपवित संस्कार भी हुए। फिर छोटी चहड़ में तीन दिन प्रचार तथा यज्ञोपवित संस्कार हुए। एक दिन बड़ी चहड़ में प्रचार हुआ। तत्पश्चात मंढोल शेरपुरा, गोकलपुरा व खोरड़ा आदि गांवो में प्रचार किया। स्वामी जी ने वहां पर 15-16 गांवो में प्रचार किया।

सांग का विरोध :- गंगाना के पास गढ़ी गांव में सांग हो रहा था। उसी समय गंगाना में आर्य समाज का उत्सव हो रहा था। स्वामी जी ने उपने उपदेश में कहा - अरे क्षत्रियों! तुम रोज आपस में लड़कर मरते हो। क्या तुम पापियों और बदमाशों को नहीं मार सकते? हमारा धर्म कहता है कि दुष्टों को मार डालो। प्रचार सुनकर जोश में एक क्षत्रिय सांग देखने वालो के साथ मिलकर जा बैठा और अवसर पाकर गोलियां दाग दी। तीन आदमी मारे गए। इस प्रकरण में चार आदमी पकड़े गए। श्री स्वामी जी महाराज से भी पुछताछ की गई। आपने ब्यान दिया की मैने यह कहा था की बदमाशी फैलाने वाले पापियों को मार दो। उपदेशकों का यह काम होता है। पकड़े गए चार आदमियों के विषय में जब आपसे पुछा गया कि यह चारों आदमी प्रचार सुनने वालो में थे ? स्वामी जी बोले में इस विषय में कुछ नहीं कह सकता। इस प्रकरण में कोई ठोस सबूत न मिलने पर वकील की तार्किक युक्तियों के कारण केश खारिज हो गया और सब बरी कर दिए गए।

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