आर्य वीर दल में समन्वय की उपयोगिता पर प्रेरक संवाद एवं चिंतन -
आचार्य ज्ञान प्रकाश वैदिक
प्रांतीय संचालक,
आर्य वीर दल पूर्वी उत्तर प्रदेश
वन के मध्य स्थित “ऋषिकुंज” नामक एक आश्रम था। यह आश्रम केवल तप और साधना का ही केंद्र नहीं, बल्कि संगठन, सेवा और चरित्र निर्माण का जीवंत उदाहरण भी था। यहाँ अनेक युवक-युवतियाँ आते, शिक्षा ग्रहण करते और समाज सेवा के कार्यों में भाग लेते थे।
किन्तु कुछ समय से आश्रम में एक समस्या उत्पन्न हो गई थी। सभी कार्यकर्ता अपने-अपने कार्यों में तो कुशल थे, परन्तु आपसी समन्वय का अभाव था। कोई अपने कार्य को सर्वोत्तम मानता, तो कोई दूसरे के कार्य को तुच्छ समझता। परिणाम यह हुआ कि आश्रम के बड़े-बड़े कार्य अधूरे रहने लगे।
एक दिन आश्रम के आचार्य जी ने सभी कार्यकर्ताओं को एकत्र किया। उनके चेहरे पर गंभीरता थी, परंतु वाणी में करुणा और प्रेरणा का स्वर था।
उन्होंने कहा—
“वत्सों! तुम सबमें योग्यता है, परंतु संगठन में केवल योग्यता पर्याप्त नहीं होती, समन्वय आवश्यक होता है। बिना समन्वय के संगठन एक शरीर की तरह है जिसमें अंग तो हैं, पर वे एक-दूसरे से जुड़े नहीं हैं।”
सभी मौन हो गए।
आचार्य जी ने एक प्रयोग किया। उन्होंने पाँच युवकों को आगे बुलाया और प्रत्येक को एक-एक लकड़ी दी।
“इन्हें तोड़ो,” उन्होंने कहा।
सभी ने अपनी-अपनी लकड़ी आसानी से तोड़ दी।
फिर उन्होंने पाँचों लकड़ियों को एक साथ बाँधकर एक गट्ठर बनाया और कहा—
“अब इसे तोड़ो।”
युवकों ने पूरी शक्ति लगा दी, परंतु कोई भी उस गट्ठर को नहीं तोड़ सका।
आचार्य जी मुस्कुराए—
“यही संगठन है, और यही समन्वय का प्रभाव है। जब तुम अलग-अलग हो, तो कमजोर हो; जब एक हो, तो अजेय हो।”
उस दिन के बाद कार्यकर्ताओं ने निश्चय किया कि वे केवल अपने कार्य में ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के कार्य में सहयोग भी करेंगे।
धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा।
रसोई का कार्य करने वाला व्यक्ति अब शिक्षण कार्य में भी सहायता करने लगा।
शिक्षक सेवा कार्यों में हाथ बँटाने लगे।
प्रत्येक कार्यकर्ता यह सोचने लगा— “मेरा नहीं, हमारा कार्य।”
कुछ ही समय में आश्रम का वातावरण बदल गया।
जहाँ पहले अव्यवस्था थी, वहाँ अब सुव्यवस्था थी।
जहाँ पहले मतभेद थे, वहाँ अब प्रेम और सहयोग था।
एक दिन आश्रम में एक बड़ा आयोजन होना था। पहले ऐसे आयोजनों में बहुत कठिनाई होती थी, परंतु इस बार सभी ने मिलकर कार्य किया।
कोई व्यवस्था देख रहा था, कोई अतिथियों का स्वागत कर रहा था, कोई भोजन की व्यवस्था कर रहा था।
कार्य इतना सुंदर और सफल हुआ कि दूर-दूर तक उसकी चर्चा होने लगी।
आचार्य जी ने अंत में कहा—
“देखो वत्सों! संगठन का आधार केवल संख्या नहीं, समन्वय है। और समन्वय का आधार है—सहयोग, त्याग और परस्पर सम्मान।”
संगठन में समन्वय की उपयोगिता-
समन्वय संगठन की आत्मा है। इसके बिना कोई भी संगठन लंबे समय तक टिक नहीं सकता।
यह कार्यों को सरल और प्रभावी बनाता है।
यह व्यक्तियों के बीच विश्वास और एकता उत्पन्न करता है।
यह समय और संसाधनों की बचत करता है।
यह संगठन को मजबूत और स्थायी बनाता है।
संगठन करने के उपाय-
1-स्पष्ट उद्देश्य निर्धारण – सभी को लक्ष्य ज्ञात हो।
2-कर्तव्यों का विभाजन – प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमता अनुसार कार्य दिया जाए।
3-नियमित संवाद – संवाद की कमी ही अधिकांश समस्याओं का कारण होती है।
4-नेतृत्व का आदर्श – नेता स्वयं अनुशासन और सहयोग का उदाहरण बने।
5-सम्मान और प्रोत्साहन – प्रत्येक कार्यकर्ता का सम्मान हो।
सहयोग और उसका लाभ-
1-सहयोग संगठन का प्राण है।
2-इससे कार्य में गति आती है।
3-कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं।
4-मन में उत्साह और प्रेरणा बनी रहती है।
5-संगठन में स्थायित्व और सफलता सुनिश्चित होती है।
समन्वय, सहयोग और संगठन—ये तीनों ऐसे सूत्र हैं जो किसी भी समूह को सफलता के शिखर तक पहुँचा सकते हैं।
यदि प्रत्येक कार्यकर्ता यह संकल्प ले ले कि “मैं नहीं, हम”, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं रह जाता।
यही संदेश “ऋषिकुंज” की इस कहानी में छिपा है—
एकता में शक्ति है, पर समन्वय में विजय है।