“आर्य समाज की वह महान विभूति, जिन्होंने ऋषिवर के अधूरे वेद-भाष्य को पूर्ण किया तथा अनेक दार्शनिक ग्रन्थों की रचना की-ऐसे महापुरुष का परिचय प्रत्येक आर्य युवा के लिए अनिवार्य रूप से ज्ञेय है...”
माननीय पण्डित श्री शिव शंकरशर्मा काव्यार्थ जी का जन्म 'चिहुंटा' ग्राम, डाकखाना कमतौल, जिला दरभंगा, बिहार प्रदेश में एक सुप्रतिष्ठित मैथिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह स्थान संस्कृत व्याकरण, नव्य न्याय तथा दार्शिनिकों के लिये बहुत प्रसिद्ध है। पौराणिकों का तो यह एक गढ़ ही समझा जाता है।
श्री पण्डित जी का पठन-पाठन कुल की प्राचीन परम्परा के अनुसार हुआ। आपने संस्कृत साहित्य का पूर्ण अवगाहन अपना ध्येय निश्चित किया। स्वर्गीय श्री पण्डित अम्बिकादत्त जी व्यास जो कि संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान् थे, एवं उस समय के चतुर विद्वानों में प्रमुख स्थान-रखते थे, वे श्री काव्यतीर्थ जी के गुरु थे। श्री व्यास जी की महर्षि दयानन्द सरस्वती जी से पटना में भेंट हुई थी और कुछ संवाद भी हुआ था।
श्री व्यास जी ने रोष में आकर महर्षि से कहा था-
"लोग श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों का खण्डन तो झट करने लग जाते हैं, परन्तु उनकी अपनी योग्यता की यह अवस्था है कि श्रीमद्भागवत के श्लोकों की जोड़ के पाँच श्लोक भी नहीं बना सकते।"
इस पर हँसते हुए महर्षि ने प्रत्युत्तर में उसी समय पादत्राण' और 'चरणपादुका' का परस्पर संवाद ही विषय रखकर धारा-प्रवाह, सुललित छन्दों में श्लोक-रचना आरम्भ कर दी थी।
तब महर्षि के अगाध पाण्डित्य का लोहा श्री व्यास जी को मानना पड़ा था।
श्री व्यास जी, श्री शिवशंकर जी को महर्षि की महिमा, विद्या और जीवन सम्बन्धी घटनायें प्रायः सुनाया करते थे। इस प्रकार शिवशंकर के हृदय में महर्षि के प्रति भक्तिभाव और विशेष अनुराग का बीज बोने वाले भी श्री व्यास जी ही थे। (स्वामी अभेदानंद जी सरस्वती)
Note–“ मैं उपर्युक्त तथ्य को स्वीकार करने में असमर्थ पाता हूं क्योंकि,ऋषिकृत संस्कृत वाक्य प्रबोध की कुछ मुद्रण विषयक कृतियों की ओट में अंबिकादत्त जी ने उसका अबोध निवारण नामक पुस्तक लिखकर खंडन प्रकाशित किया था...” (डॉक्टर भवानी लाल भारतीय)
यह कैसा विचित्र संयोग है कि प्रसिद्ध पौराणिक पण्डित अम्बिकादत्त व्यास जिन्होंने महर्षि दयानन्द की भरपेट निन्दा की उन्हीं की छत्रछाया में आपने संस्कृत का उच्च शिक्षण प्राप्त किया।
अस्तु ! शिवशंकर जी ने जब पहले-पहल महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों को पढ़ा, तो उन्हें पता चला कि उनका उस समय तक का सारा समय और परिश्रम व्यर्थ ही गया है। वेदों के ज्ञान के बिना उनकी सम्पूर्ण विद्या और योग्यता निष्फल है। अतः उन्होंने वेदों के अध्ययन में विशेष परिश्रम करना आरम्भ किया और फिर तो अपना सारा जीवन ही उन्होंने वेदों के मनन, पठन-पाठन और प्रचार में लगा दिया।
जब श्री पण्डित शिवशंकर जी एक कट्टर आर्यसमाजी, आर्योपदेशक और महर्षि दयानन्द के अनुयायी, वेदप्रचारक के रूप में खड़े हुए, तो मैथिल मण्डल में बहुत भारी हल-चल मच गई। रूढ़िवांदी बिहार में और उसमें भी पौराणिकों के सुदृढ़ और सुप्रसिद्ध गढ़ मिथिला में यह एक असाधारण घटना थी।पौराणिक पंडित श्री शिवशंकर जी के घोर शत्रु बन गए और उनको अनेक प्रकार से हानि पहुँचाने का प्रयास करने लगे। श्री पण्डित जी उस समय तक अपने घर पर 'चिहुंटा' ग्राम में ही रहते थे।
श्री पण्डित जी ने पौराणिक मण्डल को शास्त्रार्थ के लिये ललकारा तथा उस समय कमतौल में आर्यसमाज की स्थापना भी हो गई। इससे दरभंगा जिले में आर्यसमाज और पण्डित जी के विरुद्ध और भी अधिक विक्षोभ फैल गया। उद्दण्ड राजकर्मचारियों ने उपद्रव आरम्भ कर दिया। इस पर श्री पण्डित जी ने तत्कालीन महाराजाधिराज दरभंगा को एक विस्तृत पत्र लिखा और उनसे न्याय की याचना की। परन्तु उस समय वहाँ कौन सुनता था।
महाराजाधिराज दरभंगा की ओर से निराश होकर श्री पण्डित जी रांची चले गए और रांची को अपना कार्यक्षेत्र बनाकर श्री बाबू बालकृष्ण सहाय जी बार. एटला, प्रथम प्रधान, "बंगाल-बिहार आर्य प्रतिनिधि सभा के साथ वैदिक-धर्म-प्रचार की व्यवस्था में लग गये।
बिहार से पण्डित जी अजमेर चले गये और वहाँ रहकर उन्होंने छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों के महान् भाष्य तैयार किये।
फिर महात्मा मुंशी राम जी (स्वामी श्रद्धानन्द जी) का निमन्त्रण पाकर श्री पण्डित जी पञ्जाब चले गये और गुरुकुल विश्वविद्यालय कांगड़ी के सर्वप्रथम वेदोपाध्याय नियुक्त किये गये। फिर कुछ काल पश्चात् आर्यप्रतिनिधि सभा पंजाब ने श्री पण्डित जी को गुरुकुल से बुला लिया। तब जालन्धर और लाहौर में रहकर पण्डित जी ने जो आर्यसमाज की बहुमूल्य सेवाएँ कीं, वे बहुत अधिक और चिर-स्मरणीय हैं।
पंजाब (जालन्धर और लाहौर) में रहकर ही पण्डित जी ने अपने ओंकार-निर्णय, त्रिदेव-निर्णय, जाति-निर्णय, श्राद्ध-निर्णय, वैदिक इतिहासार्थ-निर्णय आदि बड़े-बड़े ग्रन्थों की रचना की थी।
“आपके साहित्य का प्रभाव उत्तर तक ही सीमित नहीं रहा, केरल विश्वविद्यालय में आचार्य नरेंद्र जी की एक मलयालम पुस्तक बी॰ ए॰ में पाठ्य पुस्तक के रूप में पढ़ाई जाती थी इस पुस्तक का आधार श्री पंडित जी की त्रिदेव निर्णय ही है ऐसा नरेंद्र भूषण जी स्वयं बताया करते थे...” (प्रोफेसर राजेंद्र जी जिज्ञासु)
“पंडित जी की यह कृतियां आर्य साहित्य का एक पंडित पूर्ण अंग है...” (पंडित चमूपति एम॰ ए॰)
“ऋषि दयानंद की वेद विषयक दृष्टिकोण को जितना पंडित गुरुदत्त जी और शिवशंकर जी काव्यतीर्थ ने समझा उतना और किसी ने नहीं...” (स्वामी वेदानंद जी तीर्थ)
समय-समय पर पण्डित जी ने कई साधारण पुस्तकें भी प्रकाशित कराई थीं। उनमें से कुछ पुस्तकों के नाम इस प्रकार हैं-चतुर्दश-भुवन, वसिष्ठनन्दन जी, वैदिक-विज्ञान, वैज्ञानिक सिद्धान्त अलौकिक-माला, श्रीकृष्ण-मीमांसा, प्रश्न, ईश्वरीय पुस्तक कौन ?
इनके अतिरिक्त उनकी कुछ अप्रकाशित पुस्तके भी हैं। वे इस समय कहाँ हैं? हैं, या नष्ट हो गई? इसका कुछ भी ज्ञान उपलब्ध नहीं हो सका है।
यूँ तो पण्डित जी के सभी ग्रन्थ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं; परन्तु ऋग्वेद के पिछले ढाई मण्डलों का भाष्य जो कि महर्षि दयानन्द के आकस्मिक निधन के कारण अवशिष्ट रह गया था, को भी श्री पण्डित जी ने बड़ी सावधानी से तैयार करके आर्यजनता को भेंट किया था। और कलकत्ता के प्रसिद्ध दानवीर सेठ श्री छाजूराम जी के धन से उसका प्रकाशन हुआ था।
पण्डित जी शास्त्रार्थों में भी बड़े उत्साह से भाग लेते थे। मौखिक और लेखबद्ध दोनों प्रकार के शास्त्रार्थों के लिये वे तैयार रहते थे। उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक आर्यसमाज की सेवा की। वैदिक साहित्य का निर्माण किया और अपना सम्पूर्ण जीवन तन, मन और धन आर्यसमाज के लिये न्यौछावर कर दिया।
विशेष ज्ञातव्य–
अपने जीवन के सन्ध्या-काल में उनका शरीर रक्त-विकार से दूषित होकर रुग्ण हो गया था।
उनके रोग को देखकर जब आर्यजन यह कहते "पंडित जी आपको ईश्वर ने यह भयंकर यातना दे दी" तब आप गंभीर स्वर में बोलते– ईश्वर की दया व न्याय पर्याय है ईश्वर न्याय करता है यही उसकी दया है वह प्रभु इसी कारण दयालु है कि वह अन्याय नहीं करता। मेरा रोग, मेरा दुख मेरे ही कर्मों का फल है अच्छा है कि यह भुगत जाए।(प्रोफेसर राजेंद्र जिज्ञासु जी)
ऐसे समय में भी उन्हें आर्यसमाज और वेद की चिन्ता तो घेरे ही रहती थी। एक बार पण्डित जी ने मुझसे(स्वामी अभेदानन्द जी से) कहा था कि अन्य दर्शनों के समान ही एक- 'आर्य-दर्शन' लिखने की उनकी प्रबल इच्छा है। यदि छह मास का समय भी शान्ति से एकान्त-सेवन का मिल गया, तो मैं अपना मानसिक वातावरण 'आर्य-दर्शन' लिखने के उपयुक्त बना लूँगा। उस 'आर्य-दर्शन' में आस्तिक, नास्तिक, पौरस्त्य और पाश्चात्त्य सभी प्राप्त दर्शनों का ऊहापोह करके वेद-प्रतिपादित सिद्धान्तों का मैं अकाट्य स्वरूप खड़ा करूँगा। खेद है कि उन्हें इस कार्य का अवकाश न मिला। पण्डित जी चल बसे और यह कार्य होने से रह गया।
साधारण जनता ने अज्ञानवश और विज्ञजनों ने अहम्मन्यतावश श्रद्धेय पण्डित जी के साहित्य की ओर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना कि देना आवश्यक था। इसी प्रकार उनके पारिवारिक जनों के प्रति भी उपेक्षा का ही व्यवहार हुआ है, जो कि आर्यसमाज के लिये किसी प्रकार भी शोभनीय नहीं है।
कुछ भी हो यह तो मानना पड़ेगा की शिवशंकर जी आर्य समाज के महान लेखक थे, उनके ग्रंथादि पुनर्मुद्रण की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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